महाभारत क्या है?

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महाभारत क्या है?[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

महाभारत भारतीय चेतना का वह अक्षय स्रोत है, जिसमें मनुष्य, समाज और ब्रह्म—तीनों का समन्वित दर्शन निहित है। यह केवल राजनैतिक संघर्षों का आख्यान नहीं, अपितु धर्म–संकट में पड़े मानव की अंतर्यात्रा का महाकाव्य है। महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रणीत यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड है, जिसके बिना भारतीय विचार-परम्परा की कल्पना अधूरी है।

महाभारत भारतीय मनीषा का वह विराट सागर है, जिसमें मानव जीवन की समस्त अनुभूतियाँ, संघर्ष, मर्यादाएँ और मर्यादा-भंग—सब एक साथ तरंगित होते हैं। यह केवल राजवंशों के उत्थान–पतन की कथा नहीं, अपितु मनुष्य की आत्मयात्रा का दार्शनिक आख्यान है। जिस प्रकार गंगा अपनी अनेक धाराओं से भारतीय भूमि को सींचती है, उसी प्रकार महाभारत धर्म, कर्म, ज्ञान और भक्ति की धाराओं से भारतीय संस्कृति को जीवन्त बनाता है। ‘महाभारत’ नाम स्वयं इसकी विराटता का उद्घोष करता है। यह भरतवंश की कथा होते हुए भी समस्त मानवता का इतिहास है। इसी कारण इसे इतिहास कहा गया—

इतिहासः स वै प्रोक्तः प्रज्ञावृद्धिकरः सदा।[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

धर्मार्थकाममोक्षाणां समवायोऽत्र कीर्तितः॥[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

महाभारत में लगभग एक लाख श्लोक, अठारह पर्व तथा असंख्य उपाख्यान हैं। यह ग्रंथ काव्य, दर्शन, नीति, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान—सभी का समन्वय है। इसी कारण महाभारतकार ने कहा है-  यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। जो महाभारत में नहीं है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। महाभारत’ नाम ही इसकी महत्ता का उद्घोष करता है— महत् च तत् भारतं इति महाभारतं |यह महा है, क्योंकि यह व्यापक है; यह भारत है, क्योंकि यह भारतवर्ष की आत्मा का द्योतक है। महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रणीत यह ग्रंथ न केवल महाकाव्य है, अपितु इतिहास, धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र और दर्शन का समन्वित रूप है।

महाभारत का केन्द्रीय तत्त्व ‘धर्म’ है, किंतु यह धर्म स्थिर नहीं, प्रवहमान है। यहाँ धर्म किसी कठोर विधान में नहीं बँधा, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप अपना रूप ग्रहण करता है। भीष्म की प्रतिज्ञा, युधिष्ठिर का सत्य, कर्ण का दान और कृष्ण की नीति—ये सभी धर्म की विविध व्याख्याएँ हैं।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्।[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

यह पंक्ति धर्म की गूढ़ता को उद्घाटित करती है और यह संकेत देती है कि धर्म को समझने के लिए केवल शास्त्र नहीं, विवेक भी आवश्यक है। महाभारत का हृदय श्रीमद्भगवद्गीता है। यह ग्रंथ अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता के अंतर्द्वंद्व को स्वर प्रदान करता है। मोह, विषाद और कर्तव्य-बोध—इन सबका समाधान गीता के कर्मयोग में निहित है और वह कर्मयोग यह है कि केवल कर्म करने पर ही अपना अधिकार है फल पर नहीं-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

यह श्लोक मानव को यह बोध कराता है कि कर्म करना उसका स्वधर्म है, फल की आकांक्षा बंधन का कारण है। श्रीकृष्ण महाभारत के ऐसे नायक हैं, जो कहीं युद्धरत नहीं, फिर भी युद्ध के नियंता हैं। उनकी नीति व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकमंगल की साधना है। वे बताते हैं कि जब अधर्म प्रबल हो जाए, तब नीति को कठोर होना पड़ता है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

यह उद्घोष धर्म की पुनर्स्थापना का शाश्वत सिद्धान्त है।

महाभारत में नारी केवल करुणा की मूर्ति नहीं, बल्कि चेतना की सशक्त प्रतीक है। द्रौपदी का अपमान सम्पूर्ण समाज की नैतिक विफलता का दर्पण है। उसकी मौन सभा में उठी वाणी धर्म के सिंहासन को चुनौती देती है। गांधारी का पट्टबन्ध और कुन्ती का मातृत्व—नारी-त्याग और धैर्य की चरम अभिव्यक्ति हैं।

श्रीकृष्ण महाभारत के ऐसे नायक हैं, जो कहीं युद्धरत नहीं, फिर भी युद्ध के माध्यम से धर्म के नियंता हैं | उनकी नीति व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकमंगल की साधना है। वे बताते हैं कि जब अधर्म प्रबल हो जाए, तब नीति को कठोर होना पड़ता है-  अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

  यह उद्घोष धर्म की पुनर्स्थापना का शाश्वत सिद्धान्त है।

आधुनिक मानव जिन प्रश्नों से जूझ रहा है—सत्ता, नैतिकता, पारिवारिक संघर्ष, कर्तव्य और अधिकार—उन सभी का बीज महाभारत में विद्यमान है। इसलिए महाभारत अतीत की गाथा नहीं, वर्तमान की चेतावनी और भविष्य की दिशा है।

महाभारत भारतीय आत्मा का महाकाव्य है—यह मनुष्य को उसकी सीमाएँ दिखाता है और संभावनाओं से परिचित कराता है। यह सिखाता है कि यदि मनुष्य ने अधर्मयुक्त आचरण करके कुछ भी प्राप्त करने की कोशिश की तो निश्चित रूप से उसका वह प्रयास असफल ही होगा |जीवन में प्राप्त सब कुछ करना है लेकिन धर्म के रास्ते पर चलकर|विजय से अधिक मूल्यवान है धर्मयुक्त आचरण। अतः निस्संदेह कहा जा सकता है कि— महाभारत ग्रंथ नहीं, जीवन की महागाथा है।

सन्दर्भ:[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

1-आदि-पर्व,  1/205

2-वन-पर्व,  2/313

3-भीष्म-पर्व, 2/47

4-भीष्म-पर्व,  4/47

5-भीष्म-पर्व, 4/47

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